Friday, September 12, 2014

दो शब्द शकुन्तला महाकाव्य


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                              दो शब्द 


          प्राचीन काल से काव्य - संरचना प्राणी -मात्र के कल्याण के लिए एवं मानव ज्ञानार्जन एवं मनोरंजनार्थ होती रही है । वस्तुतः काव्य भाव प्रधान तथा वसुधैव कुटुम्बकम की भावना से ओत प्रोत होता है । काव्य  अभिप्राय सामान्य जन मानस को चतुर्वर्ग की प्राप्ति कराना होता है । काव्य परमानन्द संदोह का जनक है इसलिये काव्य से पुरुषार्थ - चतुष्ट्य की प्राप्ति होती है । काव्य सुखद एवं सुकोमल बुद्धि वालों के लिए भी सुगम है । क्योंकि काव्य सहृदय व्यक्ति के अन्तः करण में अनाशक्ति -को जन्म देता है जो की मोक्ष की प्राप्ति है । जिस काव्य में सम्पूर्ण धर्मादि फल भोग के प्रति स्वाभविक चिंतन परिव्याप्त होता है वही काव्य का प्रतिपाद्य विषय भी होता है । काव्य मनुष्य  के जीवन का ताप - पाप - सन्ताप हरण करने वाला मधुपर्क महौषधि है । जिसमें स्वभावतः जन -कल्याण की भावना निहित होती है यद्यपि इस महाकाव्य  विषय दुष्यन्त एवं शकुन्तला के पवित्र -परिणय की प्रेम कथा है परन्तु विषय महाभारत ,पद्मपुराण ,तथा श्रीमद् भागवत जैसे पवित्र ग्रन्थों का अंशभूत होने के कारण कल्याणकर भी है । इस विषय पर महाकवि कालिदास जी ने संस्कृत भाषा में अभिज्ञान शकुंतलम् नामक नाटक भी लिखा है । आज आधुनिक परिपेक्ष में संस्कृत भाषा जन मानस से दूर जा चुकी है ऐसे में मैंने हिन्दी भाषा के माध्यम से शकुन्तला महाकाव्य के रूप में आपके समक्ष एक नए कलेवर में प्रस्तुत किया है । यह विषय हमारे अन्तर्मन की सुकोमल अभिव्यक्तियों को अतिशय आन्दोलित करता रहा क्योकि इसका अधिकतर अंश मुझे अपना - सा प्रतीत होता रहा इसलिए मैंने इसे अपना प्रतिपाद्य विषय बनाया । इस महाकाव्य को मैंने नव समुल्लासों में विभाजित किया है । कथानक में यत्र तत्र अपनी भावाभिव्यक्तियों के के अनुरूप परिवर्तित भी किया है । प्रथम समुल्लास में शव्द ब्रह्म  वन्दना ,मालिनी नदी ,कण्व आश्रम ,महर्षि कण्व ,गौतमी ,शकुन्तला एवं अन्य पात्रों का वर्णन है । द्वितीय समुल्लास में दुष्यन्त  का कण्व आश्रम आना ,दुष्यन्त  एवं शकुन्तला के हृदय में प्रेम का प्रस्फुटन ,था नृप का पुरी वापस जाने  वर्णन  । तृतीय समुल्लास में गौतमी द्वारा दुष्यन्त को बुलाने तथा दुष्यन्त के विरह  वर्णन है । चतुर्थ समुल्लास में  दुष्यन्त का आश्रम आना ,शकुन्तला से विवाह एवं वापस जाने  वर्णन है । पञ्चम समुल्लास में शकुन्तला की विरहवश्था ,महर्षि कण्व का आना एवं विवाह का अनुमोदन करना । षष्ठ समुल्लास में शकुन्तला विदाई की तैयारी तथा विदाई  वर्णन । सप्तम समुल्लास में शकुन्तला  सभा में जाना ,साक्ष्य न प्रस्तुत कर पाने का वर्णन । अष्टम समुल्लास में शकुन्तला द्वारा अपने बचपन का चिन्तन एवं पुत्रोत्पत्ति  वर्णन है । नवम समुल्लास में मुद्रिका मिलने पर नृप का दुखित होना एवं गुरु जनों  की आज्ञा से तीर्थाटन करना तथा सर्वदमन और शकुन्तला का वापस आना अन्त में शव्द ब्रह्म की वन्दना से काव्य का समापन किया है । 
                                                        जयप्रकाश चतुर्वेदी 
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