Saturday, March 21, 2015

श्री जयप्रकाश चतुर्वेदी जी द्वारा रचित " शकुन्तला-महाकाव्य " दुष्यंत 

एवं शकुन्तला के पवित्र अमर प्रेम की कथा के मुखर स्वर की भांतिप्रतीत

होता है l सुगठित, सुरचित, अनुपम हर शब्द सौन्दर्य एवं अत्यंत

कुशलता के साथ एक दूसरे के संग गहन भावाभिव्यक्ति की सरसता के

साथ गुंथे हुए सीपाज की भांति अपनी मोहकता से बाँध लेते हैं l 


इस पुस्तक को पढ़ते हुए वर्णित देश, परिवेश और काल जैसे साकार रूप


में ह्रदय व संज्ञाकेंद्र में स्वयं आकर उपस्थित हो जाते हैं l सम्पूर्ण काव्य-

कोष के शब्द भुवनमोहिनी से प्रतीत होते हैं l काव्य साधक की योग्यता,

परिश्रम एवं बौद्धिक प्रखरता शब्दों में से स्पष्टतः परिलक्षित, प्रस्फुटित


हो रहे हैं l
मुझे पूर्ण विश्वास है कि श्री जयप्रकाश चतुर्वेदी जी की यह पुस्तक हिंदी


काव्य जगत में सदा के लिए अमिट अक्षरों में अंकित हो जाएगी l 
आपको हमारी हार्दिक शुभकामनाएँ ... कंचन पाठक. pathakkanchan239@gmail.com
http://shakuntlamahakavya.blogspot.com/2015/03/l-l-l-l-l-l.html

Tuesday, December 9, 2014

शकुन्तला महाकाव्य समीक्षा

   फैजाबाद के चर्चित युवा कवि श्री जयप्रकाश चतुर्वेदी द्वारा विरचित शकुन्तला महाकाव्य निःसन्देह एक शाश्वत प्रेमगाथा है जो कि आधुनिक परिवेशों में प्रेम को निष्कलुष बनाता एवं निस्पृह बनाने में की प्रेरणा देता है।
      यह महाकाव्य नौसमुल्लासों में विभक्त है। महाकवि कालिदास कृत नाटक अभिज्ञान शाकुन्तलम् के परिदृश्य को हिन्दी काव्य छन्दों में अपनी शैली में प्रकट करना ही कवि चतुर्वेदी जी की अपनी मौलिकता है। अनेक कवियों ने शकुन्तला आधृत काव्य की रचना की है। इसके बावजूद भी प्रस्तुत कृति का अपना महत्व है। क्यों कि ढाई आखर प्रेम का ऐसा शब्द है जो निरन्तर समाज को जोडने की सीख देता है और रागात्मक चेतना का संचार करता है। प्रेम की पवित्रता,निस्पृहता,त्याग,समर्पण ही वन्दनीय होता है। प्रेम में छल,कपट,धूर्तता,स्वार्थपरता आदि की कोई जगह नहीं होती है।
      वर्तमान संदर्भ में नारी विमर्श और नारी अस्तित्व को बार-बार मुद्दा बनाया जा रहा है।प्रेम वासना का शिकार हो रहा है। प्रेम के प्रपंच में शोषण.बलात्कार जैसे अपराध तेजी से बढ रहे हैं ऐसे में कवि ने समाज सके सामने प्रेम का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत कर दुष्यन्त और शकुन्तला की पवित्र प्रेमगाथा को जिस मनोहारी ढंग से वर्णित किया है, वह प्रशंसनीय है। शकुन्तला की विदाई का एक प्रसंग देखिए-
         पेड  पौधे  लताएँ स भी, श्वसन निज छोढ देती हैं 
         पात  भी  पड  गये  पीले, डालियाँ  मोड  लेती हैं  
         कली भी झुक गयी दुख से, उसे खिलना नहीं आता
         युगल  सब  दूर  होते  हैं, उन्हें मिलना नहीं आता
      शकुन्तला महाकाव्य में रिश्ते-नातों सहित कर्तव्य भाव को आधुनिक परिवेश में उठाने का प्रशंसनीय किया गया है जो प्रायः लुप्त होते जा रहे हैं।इस अर्थ में कृति सर्वथा प्रासंगिक एवं पठनीय है। इसमें महाकाव्य के सारे लक्षण विद्यमान हैं। पुस्तक की छपाई-सफाई सुन्दर है।
      हिन्दी जगत में कवि की इस प्रथम सशक्त कृति को भरपूर स्नेह-सम्मान प्राप्त हो हमारी हार्दिक शुभकामनाएँ हैं।
   समीक्षक-श्री सुरेन्द्र वाजपेयी                       रचनाकार-जयप्रकाश चतुर्वेदी
                   वाराणसी
   प्रकाशित-हिन्दी प्रचारक पत्रिका वाराणसी
  http://shakuntlamahakavya.blogspot.com/2014/12/blog-post.html                                    
 रचनाकार-जयप्रकाश चतुर्वेदी

          वाराणसी
   प्रकाशित-हिन्दी प्रचारक पत्रिका वाराणसी

Friday, November 28, 2014

शकुन्तला महाकाव्य समीक्षा

            समीक्षित कृति- शकुन्तला महाकाव्य                      समीक्षक- डॅा पुष्पलता
     चुने हुए रमणीयार्थ के प्रतिपादक शब्द कलपना और मनोवेगों का सुखद संचार छुपे हुए भाव पर जितना प्रकाशमान होता है उतनी ही बेहतर काव्य रचना होती है कलात्मक रूप से किसी भाषा द्वारा अभिव्यक्त कहानी या मनोभाव ही काव्य है। ध्वनि गुणीभूत व्यंग्य और चित्र छिपा हुआ अभिप्राय गौणता और बिना व्यंग्य के भी चमत्कार करते हैं। श्रृखलाओं में विधिवत् बँधी जो किसी व्यक्ति के पूरे जीवन की कहानी हो महाकाव्य कहलाती है। प्रभाव रस का उद्रेक छिपे हुए भाव पर अधिक होता है तुकान्त में लय ताल की व्यवश्था करनी पडती है। पद्य शब्द गत्यर्थक में पद धातु निष्पन होने के कारण गति की प्रधानता इंगित करता है हृदय की रागात्मक अनुभूति और कल्पना से कवि वर्ण भावात्मक और रोचक बनाकर पाठक के हृदय पटल पर स्थापित कर पाता है। हृदय रस विभोर करने वाली भावना ,छवि नाना रूपों में, व्यापारों में भटकते हृदय को स्वार्थ सम्बन्धों के संकुचित घेरे से निकालकर शेष सृष्टि से रागात्मक सम्बन्ध जोडती है। महाकाव्य का विषय दुष्यन्त शकुन्तला के पवित्र परिणय की कथा है इस विषय पर लेखनी उठाकर कवि ने निश्चय ही आत्मविश्वास और साहस से लवरेज कार्य किया है। नये विचार नये कलेवर मेंयह विषय हमारे अन्तरमन की भावनाओं को आन्दोलित करता है। महाकाव्य नौ समुल्लासों में विभाजित है कथानक में कवि ने अपनी कल्पना के अनुरूप कथानक परिवर्तित भी किया है। परम्परा का निर्वहन करते हुये महाकाव्य के प्रराम्भ में वन्दना भी की गयी है यथा-
                 हे शव्द ब्रह्म  विनती तुमसे
                 नतमस्तक  होकर  करता हूँ
                 स्वीकार करो मम वन्दन को
                 मैं  पाँव  तिहारे  पड.ता  हूँ। 
     कथानक में दुष्यन्त का कण्व आश्रम आना,दुष्यन्त विरह वर्णन गौतमी द्वारा  बुलाने पर पुनः आना,विवाह,वापसी,शकुन्तला की विरहावश्था,विदाई,सभा में जाना,साक्ष्य प्रस्तुत न कर पाना,पुत्रोत्पत्ति का वर्णन,नृप का मुद्रिका मिलन के मिलने पर दुखित होना,शकुन्तला की वापसी,शब्द ब्रह्म की वन्दना के साथ समापन सभी कुछ क्रमशः सहज सरल ग्राह्य  भाषा में प्रस्तुत किया गया है। पाठक का मन पढते ही कथानक में डूब जाता है। शकुनतला की विदाई का दृश्य देखिए-
                  शकुन्तल मिल रही सबसे
                  गले  सबको  लगाती  है
                  आँख से  अश्रु की  धारा
                  हृदय तक छलछलाती  है।
      भाव भीने शब्दों में बुना महाकाव्य का ताना बाना अत्यन्त  खूबसूरत और आनन्द प्रदान करने वाला है। काव्यधर्म का निर्वाह गम्भीरता से निशिछलता पूर्वक किया गया है। सुधी पाठकों में पुस्तक का स्वागत पूरे उत्साह के साथ होगा। इसका मुझे पूरा विश्वास है। रचनाकार निशचय ही साहित्य जगत को सुन्दर ग्रन्थ प्रदान करने के लिए बधाई का पात्र है रचनाकार को साधुवाद-
                                डॉ पुष्पलता
                  253/1साउथ सिविल लाइन मुजफ्फरनगर
                 उ0प्र0     पिन-252002
 रचनाकार-जयप्रकाश चतुर्वेदी    
 ग्रा0-चौबेपुर,पो0-खपराडीह         
 जि0-फैजाबाद, उ0प्र0                 
 पिन-224205               
 मो0-09936955846             
     09415206296
 मूल्यमात्र-100रुपये,पृष्ठ-153
http://shakuntlamahakavya.blogspot.com/2014/11/blog-post_27.html


Tuesday, November 25, 2014

समीक्षा सतीश मधुप

समीक्षित कृति- शकुन्तला महाकाव्य                 समीक्षाक-सतीश ‘‘मधुप’’
      
          ज्यों ही मुख से शकुन्तला शव्द का उच्चारण होता है त्यों ही श्रोता की स्मृति के पन्ने  पलटने शुरू हो जाते है और सदियों से चली  आ रही  शकुन्तला  की प्रेम  कहानी स्मृति पटल पर हिलोरें मारने लगती हैं। क्यों कि संस्कृत भाषा में महाकवि कालिदास पहले ही अभिज्ञान शाकुन्तलम् नामक नाटक की रचना चुके हैं। उसी  विषय  पर श्री जयप्रकाश चतुर्वेदी जी ने हिन्दी भाषा में अपने काव्य कौशल का प्रयोग करते  हुये  नये  तेवर  में  काव्य  सर्जना की है जिसका रोचक वर्णन अन्त तक पाठक को अपने  साथ  बाँधे रखता  है। रचनाकार ने प्रत्येक समुल्लास में ऐसा दृश्यांकन किया है कि पाठक के सामने उस स्थान का विशेष चित्र उत्पन्न हो जाता है।
          प्रथम  समुल्लास  में  ईश वन्दना के साथ कण्व ऋषि के आश्रम का जो चित्र खींचा है वह  निःसन्देह मनोहारी है। विभिन्न प्रकार के वृक्षों व पौधों का वर्णन करते हुये उनके औषधीय गुणों का जो विवरण प्रस्तुत किया है हृदय स्पर्शी है यथा-
                     अतिशय पुनीत पूजनकारी
                     पीपल के पेड.  सुहाते  थे
                     नित प्राणवायु अर्पण करते
                     पावन कर्तव्य  निभाते  थे।
                                       त्रयताप नशावन  वृक्ष  वहाँ
                                       सबको नित पावन करते थे
                                       क्षणभर के अर्चन वन्दन से
                                       दुख मन के  सारे  हरते थे।
        आश्रम  के  आसपास पशु पंक्षी तथा पुष्पों  का  वर्णन  करते हुये जहाँ वातावरण को आनन्दमय बनाया है वहीं पाठक का ज्ञानवर्धन भी  किया  है पढ.ते पढ.ते पाठक एक स्थान पर आ खडा होता जैसे वह स्वयं ऋषि कण्व के आश्रम में ही उपस्थित है और मन मोहक दृश्यों का आनन्द ले रहा है जैसे-
                     यह परिदृश्य  देखकर राही
                     सम्मोहित  हो  रुक जाता
                     घटनायें  विसराकर  सारी
                     नृत्य  देखकर  सुख पाता।
        आश्रम  का  मनोहारी  चित्रण  करते  हुये  रचनाकार ने एक महत्वपूर्ण बात  को  सफलता  पूर्वक सिद्ध किया है कि जहाँ इतना सुरम्य वातावरण होता है वहाँ  केवल  प्रकृति  की  ही  कृपा  नहीं होती वरन् साधकों की साधना  का  भी योगदान  होता  है। यह  श्रेय  महर्षि  कण्व  को देकर उन्होंने मानव के यत्न को समुचित मान दिया है जिसके लिये ये पंक्तियाँ समीचीन प्रतीत होती हैं-
                   कण्व ऋषि ने ही कुटिया को
                   धरती  का  स्वर्ग बनाया था
                   जिसको अपने तपबल से ही
                   अति पावन भूमि बनाया था।
        आश्रम की स्थिति व पात्र परिचय रचनाकार  सम्पूर्ण  चेतना  का प्रयोग करते शकुन्तला के सौन्दर्य का मनभावन वर्णन किया है। सद्गुणों  के  साथ-साथ उसके अद्वितीय सौन्दर्य वर्णन कल्पना लोक में  खडा  कर देता है जिससे पाठक को उसके सौन्दर्य बोध से  सुखानुभूति होती है। ये  पंक्तियाँ  बहुत  प्रासंगिक-सी प्रतीत होती है-
                    आधुनिक विश्व सुन्दरियाँ भी
                    आगे  नतमस्तक  हो  जातीं
                    अपना  स्वरूप गुण वैभव भी
                    आगे  उसके  सब  खो जातीं।
         द्वितीय समुल्लास में राजा  दुष्यन्त की वीरता तथा अराजेय ओज एवं युद्ध  कौशल का शानदार वर्णन करते हुए शिकार किये जाने वाले जानवरों की चर्चा किया है जिसमें शाकाहार पर जोर देते हुए मानवीय मान्यता  को स्थापित  किया है। सृजन धर्मी रचनाकार ने बहुत मनोयोग से भाव व्यक्त किया है-
                     सबसे   यही  निवेदन  मेरा
                     आमिष भोजन  त्याग  करो
                     शाकाहारी  सब  बन  जाओ
                     नित प्रभु का ही ध्यान धरो।
                                       सारे सन्त यही कहते  हैं
                                       शुद्ध  अन्न जो  खाते  है
                                       अन्तर्मन निर्मल हो जाता
                                       सद्बुद्धी   वे   पाते   हैं।
          राजा दुष्यन्त के आश्रम में शुभागमन पर उनका स्वागत जबकि कण्व ऋषि आश्रम में उपस्थित नहीं हैं। उनकी अनुपस्थिति का  कारण  यह कि सत्संग हेतु अन्यत्र गये हैं। यहाँ सत्संग की महत्ता का वर्णन प्रशंसनीय है-
                   सत्संगति करने ऋषियों की
                   जिसकी  महिमा  न्यारी  है
                   क्षण में पाप नष्ट कर  देती
                   सत्संगति  अति  प्यारी  है।
                                       ज्ञान जगा देती है उर में
                                       मन के भरम  मिटा देती
                                       दीप्तमान कर देती सबको
                                       परमानन्द    करा   देती।
          आश्रम दर्शन में  राजा दुष्यन्त का  शकुन्तला से मिलन होता है तब उसके अद्वितीय सौन्दर्य का वर्णन तथा राजा  का  मन्त्र  मुग्ध  हो  जाना, उस मनोदशा का बहुत सफलता पूर्वक चित्रांकन किया है जिसे पढ.ते ही पाठक को वह भाव अपने-सा लगता है-
                   जैसे कदम बढे आगे  को
                   देख अचम्भित  हो  जाता
                   सखियों के संग जल देती
                   शकुन्तला में  खो  जाता।
                                      जैसे स्वयं स्वर्ग  की  देवी 
                                      धरा   लोक  पर  आयी  है
                                      दरश  कराकर मुझको अपना
                                      पथ  विचलित  करवायी  है।
          तृतीय समुल्लास में एक बात सबसे महत्वपूर्ण  है  कि विरहग्रस्त  नायक की मनोदशा का वर्णन किया है। काव्य  जगत  में  विरही  नायक की अन्तर्दशा का विरहिणी नायिका की तुलना  में कम  मिलता है। शकुन्तला के प्रति आशक्त होने के बाद दुष्यन्त  के मनोभावों का वर्णन करने में रचनाकार को प्रर्याप्त सफलता मिली है जो इन  पंक्तियों में परिलक्षित होती है-
                सोता हूँ मैं पलंग पे
                पर नींद नहीं  आती
                फूलों समान  शैय्या 
                मुझको नहीं  कराती।
                                  लगता है कठिन जीना
                                  उसके  बिना   हमारा
  •                                   बहती  हो  नाव  जैसे
                                  नाविक   नहीं   सहारा।
           चतुर्थ समुल्लास में शकुन्तला की अकुलाहट का वर्णन चित्त की एकाग्रता  में  अकुलाहट  उत्पन्न  कर  देता है। आश्रम से जाने के बाद जब दुष्यन्त  की याद सताती है तो उस समय शकुन्तला की अन्तर्वेदना का वर्णन पाठक को उन्हीं हालातों में लाकर खडा कर देता है। इन पंक्तियों में वह वेदना साक्षात दिखाई देती है-
                 उनसे लगन न लगती
                 ऐसी  दशा  न  होती
                 यादें    नहीं   सतातीं
                 मैं  नींद  भरके सोती।
          उल्लेखनीय  बात यह है कि जब दुष्यन्त पुनः आश्रम में आते हैं तब शकुन्तला  से  मिलन  से  उत्पन्न  सुख  का वर्णन भी प्रशंसनीय है ये पंक्तियाँ उन भावों का साक्षात प्रमाण हैं-
                भौंरा  सुमन  बनें   हैं
                उपवन की जो कली थी
                जैसे   नदी  स्वयं  ही
                सागर में जा मिली  थी।
           पंचम समुल्लास में दुष्यन्त  के  प्रस्थान के बाद शकुन्तला की विरह वेदना का वर्णन पाठक को य़थार्थ के धरातल पर खडा कर देता है। यह भाव स्वतः उत्पन्न हो जाता है कि जब मन कहीं लगता  न हो तो परमात्मा  की  आराधना  भाव पूर्वक नहीं हो पाती। शकुन्तला के मुख से व्यक्त यह भाव इसी यथार्थ को रेखांकित करता है-
                मैं  सुबह-शाम  की  पाठ  पूजा
                अर्चना   वन्दना   भूल   जाती
                ध्यान कर जिससे जीवन सँवरता
                इष्ट  की   प्रार्थना  भूल  जाती।
          आश्रम की निवासिनी शकुन्तला जब राजा दुष्यन्त की सहधर्मिणी बन जाती है  जिसके बाद महर्षि कण्व के आने पर अपने  बारे  में सोचती है कण्व के बुलाने पर डरी हुई जाती है फिर महर्षि जी समझाते हैं-
                यदि मिले स्वर्ग की वस्तु सारी
                जग  में  कोई अपर चाहता है
                मोक्ष के द्वार  पर कोई पहुँचे
                फिर कहाँ  लौटना  चाहता  है।
         षष्ठ समुल्लास में शकुन्तला की विदाई का वर्णन  बहुत ही रोचक ढंग से प्रस्तुत किया है बेटी  की विदाई के समय हर आँख  नम होती है।वह वियोग प्रकृति के माध्यम से व्यक्त किया जाना रोचकता उत्पन्न कर देता है-
                सभी चिडियाँ छोड.  दाना
                चहकना  छोड.  देतीं  हैं
                सभी कलियाँ खिली रहतीं
                महकना  छोड.  देती  हैं।
                                    कली भी झुक गयी दुख से
                                    उसे  खिलना  नहीं  आता
                                    युगल  सब  दूर  होते  हैं
                                    उन्हें  मिलना  नहीं  आता।
         अपनों से विछुडते समय शकुन्तला की  मनोदशा का वर्णन पढ.कर ऐसा प्रतीत होता है मानों यह अकेली शकुन्तला की पीडा नहीं वरन हर युवती की पीडा है जो अपनों से अलग होते समय सहन करती है उसका वर्णन करते  हुए  रचनाकार ने एक  शब्द  चित्र खींचा है-
                शकुन्तल मिल रही सबसे
                गले  सबको  लगाती  है
                आँख से अश्रु  की  धारा
                हृदय तक  छलछलाती है।
         सप्तम समुल्लास में शकुन्तला  के  हस्तिनापुर आगमन की चर्चा जहाँ शकुन्तला के सामने  उत्पन्न संकट  का  वर्णन  है   वहीं  हस्तिनापुर सिंहासन व राजमहल का वर्णन भी पाठक के मन को आकर्षित करता है-
                नीलम पुष्पराज मणियों के
                खम्भे    खूब     सुहाते
                बने चित्र दीवारों  पर  भी
                मन  को   खूब   लुभाते।
                                   राज सिंहासन  भी  सोने  का
                                   मणियाँ   जडी    हुई    थीं
                                   चमक नहीं जिसकी कम होती
                                   लडियाँ    लगी    हुई   थीं।
         शकुन्तला को अब तक  हुई  रचनाओं  में  अधिकांश रचनाओं में शकुन्तला एक मौन नायिका है जो  अपनी पीडा को  अन्तस  में  महसूस तो करती है परन्तु व्यक्त नहीं कर पाती। अंगूठी  खो  जाने के बाद वह सभा से चली जाती है यदि वह चाहती तो प्रमाम स्वरूप आश्रम के लोगों को  एकत्रित  कर  अपना  पक्ष रखती किन्तु सब कुछ मौन रहकर सहने वाली नायिका का नाम ही शकुन्तला है उसका वर्णन-
             शकुन्तला चुपचाप खडी थी
             भरी   सभा   में    सारी
             अपनी बात  कहे  वह कैसे
             पडी    सोच   में   भारी।
         अष्टम समुल्लास में हस्तिनापुर से आहत भाव से लौटी शकुन्तला में उत्पन्न उन  भावनों का वर्णन है जिसमें माँ से सन्तान का लगाव व्यक्त होता है जहाँ एक तरफ वह  इन भावों में खो जाती है  कि  यदि उसकी माँ का प्यार मिलता तो धन्य हो  जाती रचनाकार ने बचपन के भावों को रोचक ढंग से व्यक्त किया है-
             माता नित नई कहानी
             किस्से  मुझे   सुनाती
             झूले   में  बैठा  करके
             झूला   मुझे   झुलाती।
                             माँ हाथ पकडकर  मेरा 
                             मेला  सकल   घुमाती
                             कहती जो खेल खिलौने
                             माता मुझको दिलवाती।
      सन्तान प्राप्ति का सुख अवर्णनीय होता है पति ने स्वीकार नहीं किया, ऋषि आश्रम में जाने का मन नहीं हुआ उससे  उत्पन्न विषाद सवतः कम हो जाता है। इसी अनुभूति का वर्णन मन मोह लेता है-
            पायी  अधरों पर खुशियाँ
            जब  से  सन्तान  मिली
            छट गया तमस का पर्दा
            कलियाँ  तब  से  खिलीं।
                              बालक के सुख में बिसरी
                              शकुन्तला   दुख  अपना
                              बालक की खुशियों में ही
                              दिखता  है  सुख  अपना।
      नवम समुल्लास यह सिद्ध करता है कि सच्चे प्रेम का महत्व ही अलग होता है। एक मौन साधिका की सच्ची  लगन  को दुनियाँ ने भले ठुकरा दिया किन्तु परमात्मा ने कदम-कदम पर उसकी सहायता की तथा उसका प्रिय उसे प्राप्त हुआ तो आँसू निकल पडे-
             झर रही नेत्र से मोतियों की  लडी
             दोनो प्रेमी खडे के खडे  रह  गये
             बात आँखों ही आँखों में होती रही
             होंठ कँपते खुले के खुले  रह गये।
                            मीन को जल मिला प्राण सको तन मिला
                            जिन्दगी   के  लिये    प्राणवायु   मिली
                            मिल   गया  साथ  शकुन्तला  का  उसे
                            निकलते   प्राण  को  जैसे  वायु  मिली।
       उपरोक्त महाकाव्य में रचनाकार ने यह सन्देश  दिया है कि प्रेम का पन्थ बहुत कटिन होता है तथा सच्चे प्रेम को मंजिल अवश्य मिलती है अपने लक्ष्य को  प्राप्त करने हेतु अनवरत साधना करनी चाहिए ऐसे साधकों पर ही परमात्मा की कृपा बरसती है। सरल और सर्वग्राम्य भाषा का प्रयोग करते हुए  रचनाकार ने  पुस्तक को इस स्थिति में लाकर खडाकर दिया है कम शिक्षित लोग भी काब्य रस  का आनन्द ले सकें।  आशा  है कि यह प्रेरक महाकाब्य संघर्षरत  लोगों  के  लिए प्रेरणा स्रोत बनकर लोक मंगल के लिए  हितकारी सिद्ध होगा।
 रचनाकार-जयप्रकाश चतुर्वेदी                     सतीश ‘‘मधुप’’
 ग्रा0-चौबेपुर,पो0-खपराडीह                     सहायक अध्यापक
 जि0-फैजाबाद, उ0प्र0                  जैन इण्टर कालेज करहल मैनपुरी
 पिन-224205                      निवास-ग्रा0-पो0-घिरोर,जिला-मैनपुरी
 मो0-09936955846                     उत्तरप्रदेश,पिन-205121 
         09415206296
     मूल्यमात्र-100रुपये,पृष्ठ-153
http://shakuntlamahakavya.blogspot.com/2014/11/blog-post.html

Saturday, October 4, 2014

शकुन्तला महाकाव्य प्रथम समुल्लास वन्दना



 हे शब्द  ब्रह्म  विनती  तुमसे
नतमस्तक  होकर   करता  हूँ
स्वीकार करो  मम  वन्दन को
मैं  पाव   तिहारे   पड.ता  हूँ।।01।।
तुम जगती के हर कण-कण में
हे अज अविराम ध्वनित  होते
नित जन मानस के अधरों  से
बनकर   साकार  विदित  होते।।02।।
तुम  निराकारचिर  अविनाशी
प्रतिमूर्तिरूप   साकार    तुम्हीं
तुम ही शाश्वत  इस जगती में
सबके   हो   प्राणाधार  तुम्हीं।।03।।
सब  जीवों  में  सचराचर  के
वाणी  का  विस्थापन    होता
प्रकट  भावना  कर  देने  को
शब्दों  का  भी  थापन  होता।।04।।
तुमसे  सारे  जड.    चेतन  में
चैतन्य भाव  का  गुण  आता
मुक्तिकाल तक  कालचक्र  में
प्राणी   आकर   फँस   जाता।।05।।
सारा  जग  तेरे  ही  गुण  से
शब्दों  में   परिभाषित   होता
सत्, रज, तम  तीनों  रूपों  में
ज्ञानों   से   आभाषित  होता।।06।।
विनयी हो  तुम  दयावान  हो
तुम ही करुणा  के  सागर  हो
तुम  सबके  अन्तस्तल  वासी
तुम  ही  मेरे   नटनागर  हो।।07।।
सारी   दुनियाँ  में  तुमसे  ही
मृदु - भावों  की   धारा  बहती
भाषाओं   में   अनुकम्पा   से
साहित्यों   की   धारा   बहती।।08।।
कब से  अभिलाषा  जगी  मुझे
कविता  शाकुन्तल   लिखने   की
अतएव  स्वार्थ   ले  द्वार  खडा
पाकर  तव  कृपा   विरचने  की।।09।।
मैं  शरणागत   बन   आया  हूँ
अब मुझ  पर  दया-दृश्टि  कीजै
तुम  स्वामी  हो  मैं  सेवक  हूँ
मुझको  वरदान   अभय   दीजै।।10।।
इति. आदि. मध्य  इस कविता में
मुधको   तेरा   आलम्बन    है
कि़ञ्चित  मुझमें  सामर्थ्य  नहीं
हे   ईश   तेरा  अनुकम्पन  है।।11।।

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Friday, September 12, 2014

दो शब्द शकुन्तला महाकाव्य


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                              दो शब्द 


          प्राचीन काल से काव्य - संरचना प्राणी -मात्र के कल्याण के लिए एवं मानव ज्ञानार्जन एवं मनोरंजनार्थ होती रही है । वस्तुतः काव्य भाव प्रधान तथा वसुधैव कुटुम्बकम की भावना से ओत प्रोत होता है । काव्य  अभिप्राय सामान्य जन मानस को चतुर्वर्ग की प्राप्ति कराना होता है । काव्य परमानन्द संदोह का जनक है इसलिये काव्य से पुरुषार्थ - चतुष्ट्य की प्राप्ति होती है । काव्य सुखद एवं सुकोमल बुद्धि वालों के लिए भी सुगम है । क्योंकि काव्य सहृदय व्यक्ति के अन्तः करण में अनाशक्ति -को जन्म देता है जो की मोक्ष की प्राप्ति है । जिस काव्य में सम्पूर्ण धर्मादि फल भोग के प्रति स्वाभविक चिंतन परिव्याप्त होता है वही काव्य का प्रतिपाद्य विषय भी होता है । काव्य मनुष्य  के जीवन का ताप - पाप - सन्ताप हरण करने वाला मधुपर्क महौषधि है । जिसमें स्वभावतः जन -कल्याण की भावना निहित होती है यद्यपि इस महाकाव्य  विषय दुष्यन्त एवं शकुन्तला के पवित्र -परिणय की प्रेम कथा है परन्तु विषय महाभारत ,पद्मपुराण ,तथा श्रीमद् भागवत जैसे पवित्र ग्रन्थों का अंशभूत होने के कारण कल्याणकर भी है । इस विषय पर महाकवि कालिदास जी ने संस्कृत भाषा में अभिज्ञान शकुंतलम् नामक नाटक भी लिखा है । आज आधुनिक परिपेक्ष में संस्कृत भाषा जन मानस से दूर जा चुकी है ऐसे में मैंने हिन्दी भाषा के माध्यम से शकुन्तला महाकाव्य के रूप में आपके समक्ष एक नए कलेवर में प्रस्तुत किया है । यह विषय हमारे अन्तर्मन की सुकोमल अभिव्यक्तियों को अतिशय आन्दोलित करता रहा क्योकि इसका अधिकतर अंश मुझे अपना - सा प्रतीत होता रहा इसलिए मैंने इसे अपना प्रतिपाद्य विषय बनाया । इस महाकाव्य को मैंने नव समुल्लासों में विभाजित किया है । कथानक में यत्र तत्र अपनी भावाभिव्यक्तियों के के अनुरूप परिवर्तित भी किया है । प्रथम समुल्लास में शव्द ब्रह्म  वन्दना ,मालिनी नदी ,कण्व आश्रम ,महर्षि कण्व ,गौतमी ,शकुन्तला एवं अन्य पात्रों का वर्णन है । द्वितीय समुल्लास में दुष्यन्त  का कण्व आश्रम आना ,दुष्यन्त  एवं शकुन्तला के हृदय में प्रेम का प्रस्फुटन ,था नृप का पुरी वापस जाने  वर्णन  । तृतीय समुल्लास में गौतमी द्वारा दुष्यन्त को बुलाने तथा दुष्यन्त के विरह  वर्णन है । चतुर्थ समुल्लास में  दुष्यन्त का आश्रम आना ,शकुन्तला से विवाह एवं वापस जाने  वर्णन है । पञ्चम समुल्लास में शकुन्तला की विरहवश्था ,महर्षि कण्व का आना एवं विवाह का अनुमोदन करना । षष्ठ समुल्लास में शकुन्तला विदाई की तैयारी तथा विदाई  वर्णन । सप्तम समुल्लास में शकुन्तला  सभा में जाना ,साक्ष्य न प्रस्तुत कर पाने का वर्णन । अष्टम समुल्लास में शकुन्तला द्वारा अपने बचपन का चिन्तन एवं पुत्रोत्पत्ति  वर्णन है । नवम समुल्लास में मुद्रिका मिलने पर नृप का दुखित होना एवं गुरु जनों  की आज्ञा से तीर्थाटन करना तथा सर्वदमन और शकुन्तला का वापस आना अन्त में शव्द ब्रह्म की वन्दना से काव्य का समापन किया है । 
                                                        जयप्रकाश चतुर्वेदी 
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Thursday, September 11, 2014

शकुन्तला महाकाव्य जयप्रकाश चतुर्वेदी के द्वारा रचित हिन्दी महाकाव्य है जो कि नौ समुल्लासों में विभाजित है जिसे इस ब्लॉग में समयानुसार पोस्ट अपडेट किया जाता रहेगा ॥ 
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